मुंबई के ऐतिहासिक अगस्त क्रांति मैदान में आयोजित ‘वसुधैव कुटुंबकम की ओर’ कॉन्क्लेव और प्रदर्शनी का तीसरा दिन गहन संवैधानिक विमर्श, कानूनी मंथन और छात्र सहभागिता के नाम रहा। 18 जनवरी को आयोजित इस कार्यक्रम में कानून के दिग्गजों, पूर्व न्यायाधीशों, वरिष्ठ अधिवक्ताओं और छात्रों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली।
पूरे दिन ‘वसुधैव कुटुंबकम’ प्रदर्शनी दर्शकों के लिए खुली रही, जहां न्यायपूर्ण और शाश्वत विश्व व्यवस्था के लिए प्राचीन भारतीय ज्ञान में निहित परिवार के 12 शाश्वत सिद्धांतों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया। इसके साथ ही भारतीय संविधान के 75 वर्षों पर आधारित विशेष प्रदर्शनी में संयुक्त परिवार की संगठन क्षमता, संवैधानिक संतुलन, सामाजिक जिम्मेदारी और नैतिक शासन जैसे विषयों को दर्शाया गया, जिसने आगंतुकों का विशेष ध्यान आकर्षित किया।
इस दिन का एक प्रमुख आकर्षण छात्रों की भागीदारी रही। विशेष रूप से बनाए गए ‘स्टूडेंट एंगेजमेंट ज़ोन’ में मूट कोर्ट के सेमी-फाइनल और फाइनल राउंड आयोजित किए गए। विधि के छात्रों ने कानूनी तर्क, वकालत कौशल और प्रक्रिया की गहरी समझ का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। फाइनल राउंड के बाद आयोजित सम्मान समारोह में प्रतिभागियों की मेहनत और प्रतिभा को सराहा गया, जिससे युवाओं का उत्साह और आत्मविश्वास बढ़ा।

कानूनी चर्चाओं के क्रम में मथुरादास हॉल में ‘मौलिक अधिकार’ विषय पर पैनल-3 आयोजित किया गया। इस सत्र में बॉम्बे हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता रफीक दादा, ज़ाल अंध्यारुजिना, प्रदीप संचेती और चेतन कपाड़िया ने मौलिक अधिकारों के विकास, उनकी व्याख्या और वर्तमान चुनौतियों पर विस्तृत विचार रखे। चर्चा के दौरान न्यायिक संतुलन, नागरिक स्वतंत्रता और संवैधानिक सुरक्षा जैसे अहम मुद्दों पर गहन संवाद हुआ।
दोपहर बाद ‘संविधान और जीवन के अन्य क्षेत्र’ विषय पर पैनल-4 का आयोजन किया गया। इसमें भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश बी.एन. श्रीकृष्णा, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता संजय उपाध्याय, वरिष्ठ अधिवक्ता नौशाद इंजीनियर, बीसीएमजी के उपाध्यक्ष उदय वारुंजीकर और बॉम्बे हाई कोर्ट के अधिवक्ता मयूर खांडेपरकर ने कानून और उभरते क्षेत्रों के बीच संबंध, पर्यावरणीय चुनौतियों और संस्थागत दृष्टिकोण पर अपने विचार साझा किए।
शाम के सत्र में राजनीति, बिजनेस, कीमती धातुओं और पर्यावरण–जलवायु जैसे विषयों पर आधारित पॉडकास्ट चर्चाएं आयोजित की गईं। इन चर्चाओं ने आम जनमानस को सरल और सटीक जानकारी देने के साथ-साथ कॉन्क्लेव में संवाद का एक नया आयाम जोड़ा।
कुल मिलाकर, वसुधैव कुटुंबकम 4.0 का तीसरा दिन संविधानिक संवाद, छात्र सशक्तिकरण और सांस्कृतिक चेतना के प्रभावी समन्वय के रूप में यादगार रहा।