Home राज्यमहाराष्ट्रमेयर पद के लिए कुछ भी? ‘बीजेपी चांद-मंगल पर भी महापौर बना देगी’, सामना के संपादकीय में महायुति पर तीखा हमला

मेयर पद के लिए कुछ भी? ‘बीजेपी चांद-मंगल पर भी महापौर बना देगी’, सामना के संपादकीय में महायुति पर तीखा हमला

by ashishppandya90@gmail.com
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स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में तीखी बयानबाज़ी शुरू हो गई है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) गुट के मुखपत्र सामना के संपादकीय में बीजेपी, शिंदे गुट और दलबदल की राजनीति पर सीधा हमला बोला गया है। संपादकीय में सत्ता, धन और पुलिस तंत्र के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए कहा गया है कि अगर सत्ता साथ हो तो बीजेपी “चांद और मंगल” पर भी अपना महापौर बना सकती है।
सामना ने लिखा है कि महानगरपालिका चुनाव पूरे होने के बाद प्रशासकों का मनमाना शासन खत्म होकर जनप्रतिनिधियों का शासन लौटना चाहिए बशर्ते मुख्यमंत्री चाहें। बीजेपी के 11 में से 10 महापौर बनने पर कटाक्ष करते हुए संपादकीय में कहा गया कि सत्ता, पैसा और पुलिस का साथ हो तो किसी भी जगह परिणाम मनचाहे बनाए जा सकते हैं।

मुंबई में रितु तावड़े के महापौर बनने को लेकर सामना ने इसे मराठी अस्मिता की जीत बताया है। लेख में कहा गया कि मराठी पहचान के दबाव और शिवसेना के आंदोलन के चलते बीजेपी को अपनी इच्छा के विरुद्ध ही सही, महापौर पद के लिए मराठी चेहरा चुनना पड़ा। संपादकीय में दावा किया गया कि इससे यह स्पष्ट हुआ कि “मुंबई का मराठी… हिंदू ही है।”
रितु तावड़े के बांग्लादेशियों पर दिए गए बयान को लेकर भी सामना ने सवाल खड़े किए हैं। संपादकीय में पूछा गया है कि क्या प्रधानमंत्री इस रुख से सहमत हैं। साथ ही बांग्लादेश को दी जा रही आर्थिक मदद और वहां हिंदुओं पर हो रहे हमलों का जिक्र करते हुए इसे विरोधाभास बताया गया है।
मीरा-भायंदर में अमराठी महापौर बनाए जाने को मराठी जनता की अनदेखी करार दिया गया है। वहीं नासिक और कल्याण-डोंबिवली में दलबदल को नैतिक पतन का उदाहरण बताया गया। सामना ने लिखा कि चुनाव चिह्न की स्याही सूखने से पहले ही विधायक और नगरसेवक पाला बदल रहे हैं, जो जनता के जनादेश के साथ विश्वासघात है।

दलबदल की राजनीति पर तीखे शब्दों में हमला करते हुए संपादकीय में कहा गया कि मनसे और शिवसेना के साथ चुने गए प्रतिनिधियों का शिंदे गुट में जाना गद्दारी है। मालेगांव में एआईएमआईएम के साथ गठबंधन की कोशिश पर भी सवाल उठाए गए और आरोप लगाया गया कि सत्ता के लिए हिंदुत्व और सिद्धांतों से समझौता किया जा रहा है।
सामना ने आरोप लगाया कि ठेके, निधि और समितियों के लालच में जनप्रतिनिधि जनता के वोट से धोखा कर रहे हैं। महाराष्ट्र का खजाना खाली होने के बावजूद छोटे-छोटे चुनावों में करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। सरकारी निधि के भेदभावपूर्ण वितरण को अलोकतांत्रिक बताते हुए संपादकीय के अंत में कहा गया कि राज्य की राजनीतिक संस्कृति का गहरा पतन हो चुका है और इसके लिए सत्ताधारी पूरी तरह जिम्मेदार हैं।

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