यूक्रेन युद्ध के बाद रूस को जिस देश से सबसे बड़ा सहारा मिला, वही भारत अब उसकी चिंता बढ़ाता नजर आ रहा है। पश्चिमी देशों के कड़े प्रतिबंधों के बीच भारत रूसी कच्चे तेल का बड़ा खरीदार बनकर उभरा था, लेकिन हाल के महीनों में भारत ने रूसी तेल की खरीद में भारी कटौती की है। इसका सीधा असर रूस की पहले से दबाव में चल रही अर्थव्यवस्था पर पड़ा है।
अमेरिका और यूरोप के प्रतिबंधों के कारण रूस की तेल और गैस से होने वाली कमाई में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। बीते साल रूस की ऊर्जा निर्यात से आय महामारी के बाद अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई। हालात इतने खराब हो गए कि रूस को अपने नेशनल वेल्थ फंड से विदेशी मुद्रा और सोना बेचने का सहारा लेना पड़ रहा है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, रूसी वित्त मंत्रालय जनवरी से फरवरी के बीच रोजाना अरबों रूबल के चीनी युआन और सोने की बिक्री कर रहा है। यह अब तक की सबसे बड़ी बिक्री मानी जा रही है। इसकी बड़ी वजह रूसी कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट और बढ़ता डिस्काउंट है। दिसंबर महीने में रूसी तेल की औसत कीमत गिरकर करीब 39 डॉलर प्रति बैरल रह गई, जबकि 2026 के बजट में इसे 59 डॉलर प्रति बैरल माना गया था।
इस आर्थिक दबाव का सबसे बड़ा संकेत रूस के गोल्ड रिजर्व में आई भारी कमी है। यूक्रेन युद्ध से पहले नेशनल वेल्थ फंड के पास 113 अरब डॉलर से ज्यादा की लिक्विड संपत्ति थी, जिसमें सैकड़ों मीट्रिक टन सोना शामिल था। लेकिन बीते चार सालों में रूस अपने करीब 60 फीसदी गोल्ड रिजर्व को बेच चुका है। दिसंबर 2025 तक सोने का भंडार घटकर 173 मीट्रिक टन रह गया।

भारत की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम में अहम मानी जा रही है। युद्ध के बाद भारत ने सस्ता रूसी तेल खरीदकर अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी कीं, लेकिन अब भारतीय रिफाइनरियों ने या तो खरीद बंद कर दी है या फिर इसमें बड़ी कटौती की है। इसकी एक वजह अमेरिका का दबाव भी बताया जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने पर भारत पर अतिरिक्त टैक्स लगाने की चेतावनी दी थी, जिसके बाद भारतीय उत्पादों पर अमेरिकी टैरिफ और बढ़ गया।
कुल मिलाकर, भारत की घटती तेल खरीद, गिरती कीमतें और पश्चिमी प्रतिबंध रूस की अर्थव्यवस्था पर दोहरी मार साबित हो रहे हैं। हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि रूस को अपने भविष्य के खर्च चलाने के लिए भी लगातार अपने भंडार खाली करने पड़ रहे हैं।