मुंबई में बिल्डर सुशील रहेजा द्वारा युवक राहुल जाधव के साथ कथित जातिसूचक गाली-गलौज और मारपीट के मामले ने अब नया मोड़ ले लिया है। इस प्रकरण में वंचित बहुजन आघाड़ी के कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी को अदालत ने अवैध करार देते हुए मुंबई पुलिस को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत के आदेश के बाद वंचित बहुजन आघाड़ी के सभी गिरफ्तार कार्यकर्ताओं को रिहा कर दिया गया है।
बताया जा रहा है कि आरोपी बिल्डर सुशील रहेजा ने अपने ऑफिस में काम करने वाले राहुल जाधव के साथ न सिर्फ मारपीट की, बल्कि उन्हें जातिसूचक अपशब्द कहते हुए अपमानित भी किया। इस मामले में सुशील रहेजा के खिलाफ अट्रोसिटी एक्ट के तहत गंभीर अपराध दर्ज है, इसके बावजूद अब तक उनकी गिरफ्तारी नहीं हुई है। इसी को लेकर वंचित बहुजन आघाड़ी ने तीखा विरोध प्रदर्शन किया था।
विरोध के दौरान कथित तौर पर बिल्डर के ऑफिस में तोड़फोड़ के आरोप लगाते हुए मुंबई पुलिस ने वंचित बहुजन महिला आघाड़ी की मुंबई प्रदेश अध्यक्ष स्नेहल सोहनी, युवा आघाड़ी के मुंबई अध्यक्ष सागर गवई सहित अन्य पदाधिकारियों को देर रात गिरफ्तार कर लिया था।

आज जब सभी आरोपियों को भायखला स्थित भोईवाड़ा कोर्ट में पेश किया गया, तो अदालत ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यह गिरफ्तारी कानून के खिलाफ है। अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के उस निर्देश का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि जिन मामलों में सजा सात साल से कम है, वहां पुलिस को पहले नोटिस देना अनिवार्य है। यदि आरोपी जांच में सहयोग कर रहा हो, तो तत्काल गिरफ्तारी आवश्यक नहीं होती।
अदालत के अनुसार, मुंबई पुलिस ने बिना किसी नोटिस के सीधे गिरफ्तारी की, जो कानून का उल्लंघन है। इसी आधार पर अदालत ने वंचित बहुजन आघाड़ी के सभी कार्यकर्ताओं की रिहाई का आदेश दिया।

वहीं, वंचित बहुजन आघाड़ी ने आरोप लगाया है कि मुंबई पुलिस ने बिल्डर सुशील रहेजा और राजनीतिक दबाव में आकर झूठे मामले दर्ज किए। पार्टी का कहना है कि अट्रोसिटी जैसे गंभीर अपराध के आरोपी खुलेआम घूम रहे हैं, जबकि पीड़ित के समर्थन में आवाज उठाने वालों को निशाना बनाया गया।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर पुलिस की भूमिका और कानून के समान लागू होने पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।