अंकारा/तेहरान: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच तुर्की ने अमेरिका और ईरान के बीच टकराव टालने के लिए बड़ा कूटनीतिक दांव खेला है। तुर्की ने ईरान से आग्रह किया है कि वह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अपने विशाल तेल भंडार के सहयोग का प्रस्ताव दे, ताकि वॉशिंगटन को बातचीत की मेज पर वापस लाया जा सके और संभावित सैन्य संघर्ष को रोका जा सके।
तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगन ने अमेरिका और ईरान के राष्ट्रपतियों के बीच टेलीकॉन्फ्रेंस होस्ट करने की पेशकश भी की है। मिडिल ईस्ट आई की रिपोर्ट के मुताबिक, एर्दोगन ने डोनाल्ड ट्रंप से फोन पर बातचीत के दौरान कूटनीति का रास्ता अपनाने की अपील की और खुद मध्यस्थ बनने का प्रस्ताव रखा। तुर्की का मानना है कि अगर ईरान तेल सहयोग जैसे व्यावहारिक प्रस्ताव के साथ आगे आता है, तो ट्रंप प्रशासन बातचीत के लिए तैयार हो सकता है।

हालांकि, तुर्की के ही अधिकारियों ने यह भी साफ किया है कि इस पहल की कोई गारंटी नहीं है। अंकारा इससे पहले जून में हुए संघर्ष के दौरान भी ईरान को इसी तरह का प्रस्ताव दे चुका है, लेकिन उस वक्त तेहरान ने इसे खारिज कर दिया था। तुर्की अधिकारियों के अनुसार, यही वजह है कि मौजूदा कोशिशों को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है।
तुर्की के अखबार ‘हुर्रियत’ की कॉलमनिस्ट हांडे फिरात ने अपने लेख में लिखा है कि अगर ईरान डोनाल्ड ट्रंप को अपने विशाल तेल भंडार पर सहयोग का ठोस ऑफर देता है, तो अमेरिकी राष्ट्रपति बातचीत की टेबल पर लौट सकते हैं। लेख में यह भी कहा गया है कि तुर्की के हस्तक्षेप से भले ही फिलहाल संकट कुछ समय के लिए टल गया हो, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है।
ईरान की ओर से अब तक इस प्रस्ताव पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने भी तुर्की की पेशकश पर चुप्पी साध रखी है। हालांकि, तुर्की प्रशासन को उम्मीद है कि इस सप्ताह ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची के इस्तांबुल दौरे के दौरान इस मुद्दे पर अनौपचारिक बातचीत हो सकती है।

इस पूरे घटनाक्रम के पीछे क्षेत्रीय राजनीति भी अहम भूमिका निभा रही है। तुर्की अधिकारियों का मानना है कि वाइट हाउस पर इजरायल का प्रभाव काफी ज्यादा है और डोनाल्ड ट्रंप, इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के रुख से प्रभावित रहते हैं। 27 दिसंबर को फ्लोरिडा में ट्रंप और नेतन्याहू की मुलाकात के बाद ईरान को लेकर अमेरिकी तेवर और सख्त हुए हैं।
ट्रंप पहले ही ईरान को कई चेतावनियां दे चुके हैं। उन्होंने साफ कहा है कि अगर जल्दी समझौता नहीं हुआ, तो अगला हमला पहले से कहीं ज्यादा गंभीर होगा। जून 2025 के संघर्ष का जिक्र करते हुए ट्रंप ने इसे ईरान के लिए “बड़ा विनाश” बताया था और भविष्य में और कठोर कार्रवाई के संकेत दिए हैं।
कुल मिलाकर, तुर्की की मध्यस्थता और तेल डील का प्रस्ताव फिलहाल कूटनीति की आखिरी उम्मीद के तौर पर देखा जा रहा है। लेकिन ईरान की चुप्पी और अमेरिका-इजरायल की रणनीतिक नजदीकी को देखते हुए मिडिल ईस्ट में युद्ध का खतरा अभी टला नहीं है।